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Last Updated On: 20/12/2019

राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एन- सी- पी- सी- आर-) बाल अधिकारों की सार्वभौमिकता और गैर-उल्लंघनीयता के सिद्धांत पर बल प्रदान करता है तथा देश की समस्त बाल-संबंधी नीतियों में तात्कालिकता के समावेश को मान्यता प्रदान करता है। आयोग के लिए 0 से 18 वर्ष के आयु वर्ग में सभी बालकों के संरक्षण का समान रूप से महत्व है। अतः नीतियाँ सर्वाधिक सुमेद्य बालकों के लिए कार्यवाही किए जाने के लिए प्राथमिकता को पारिभाषित करती है। इसमें ऐसे क्षेत्रें पर बल प्रदान किया जाना भी शामिल है जो पिछड़े है तथा विशेष परिस्थितियों के अंतर्गत समुदायों अथवा बालकों, आदि पर भी समान रूप से ध्यान दिया जाता है। एन-सी-पी-सी-आर- यह मानता है कि केवल कुछ बच्चों की समस्याओं पर ध्यान देते हुए, ऐसे अनेक सुमेद्य बालकों पर संभवत ध्यान नहीं दिया जा पाता है जो परिभाषित अथवा लंक्षित श्रेणियों के अंतर्गत नहीं आते है। नीतियों के व्यावहारिक रूप में क्रियान्वित करते समय, सभी बालकों तक पहुंचने के कार्य से समझौता कर लिया जाता है तथा बाल अधिकारों के उल्लंघन को सामाजिक दृष्टि से सहन करने की प्रक्रिया चलती रहती है। इस बात का वस्तुतः लक्षित जनसंख्या के लिए तैयार किए गए कार्यक्रम पर भी प्रभाव पड़ता है। अतः इस  बात पर विचार किया गया है कि बालकों के अधिकारों के संरक्षण के पक्ष में वृहद परिवेश का निर्माण करने की प्रक्रिया में केवल वे बालक ही दृश्यमान हो पाते है तथा अपने हक की प्राप्ति करने के लिए आत्मविश्वास जुटा पाते हैं, जिन्हें लक्षित किया गया है।

इसी प्रकार, आयोग के लिए बालक द्वारा हासिल किए जाने वाले प्रत्येक अधिकार को पारस्परिक दृष्टि से पुनः प्रर्वतनकारी और अंतआश्रित  माना जाता है। अतः अधिकारों के कोटिकरण का मुद्दा पैदा ही नहीं होता है। अपने जीवन के 18वें वर्ष पर अपने समस्त अधिकारों का लाभ उठाने वाली बालिका अपने जन्म के समय से उसे प्राप्त होने वाली समस्त हकदारियों तक पंहुच पर निर्भर रहती है। अतः नीतिगत हस्तक्षेप सभी अवस्थाओं पर महत्व ग्रहण कर लेते है। आयोग के लिए, बालकों के सभी अधिकार समान रूप से महत्त्वपूर्ण है।

    • संगठनात्मक संरचना 
    • गठन 
    • कार्य और शक्तियाँ 
    • प्रशासन और वित्त 
    • अन्य अधिनियमों के अंतर्गत उत्तरदायित्व