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पूर्वोत्तर प्रकोष्ठ

Last Updated On: 18/10/2018

भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र में आठ राज्य यथा अरुणाचल प्रदेश, असम, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नागालैण्ड, त्रिपुरा तथा सिक्किम आते हैं। यह क्षेत्र शेष भारत से भूटान और बांग्लादेश के बीच मौजूद एक बहुत ही संकरे गलियारे ‘‘चिकन नेक’’ से जुड़ा हुआ है। यह क्षेत्र महान प्रजातीय विभिन्नताओं की भूमि है और एशिया में कहीं भी किसी अन्य इतने छोटे क्षेत्र में इसकी तुलना में इससे अधिक प्रजातियां नहीं रहती हैं।
इस क्षेत्र में लोगों की राजनीतिक आकांक्षाओं के कारण अलग-अलग राज्यों की स्थापना हुई। वर्ष 1960 से 1987 के मध्य असम में से नागालैण्ड, मेघालय, मिजोरम तथा अरुणाचल प्रदेश बने हुए।  मुख्य जनजातीय समूहों में जिनमें मेघालय के गारो तथा खासी, मणिपुर के कुकी, त्रिपुरा के लुशाइस, नागालैण्ड के अंगामी, ओ तथा फोम और सिक्किम के लेप्चा शामिल हैं, असंख्य अनोखी तिब्बती-बर्मी भाषाएं बोली जाती हैं। इन क्षेत्रों में असमी, मणिपुरी, मिजो तथा अंग्रेजी भी बोली जाती है। यहां के निवासियों का प्रमुख व्यवसाय कृषि है तथा यहां बहुत बड़े चाय बागान और धान के खेत हैं।  
पूर्वोत्तर प्रकोष्ठ का गठन
निम्नलिखित उल्लिखित उद्देश्यों को ध्यान में रखते हुए तथा बच्चों से संबंधित मुद्दों को और अधिक प्रभावी व कुशल ढंग से हल करने के लिए आयोग में दिनांक 1.12.2011 को पूर्वोत्तर के इन आठ राज्यों में बाल अधिकारों के संर्वधन और संरक्षण के लिए पूर्वोत्तर प्रकोष्ठ का निर्माण किया गया। यह प्रकोष्ठ दिसम्बर, 2012 तक सम्पूर्ण स्टाफ बल के साथ काम करने लग गया था।    

  •     शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 के अन्तर्गत निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा तक पहुंच के लिए बच्चों के संवैधानिक गारण्टीयुक्त मूल अधिकार को माॅनीटर करना;
  •     बाल श्रम के उन्मूलन के लिए उठाये गये कदमों को माॅनीटर करना;
  •     पूर्वोत्तर से अन्य राज्यों में बच्चों की तस्करी की रोकथाम के लिए संबंधित राज्य सरकारों तथा अन्य स्टेकहोल्डरों द्वारा किये गये उपायों को माॅनीटर करना;
  •     बच्चों में धन के बदले दुव्र्यवहार की घटनाओं को रोकना/घटाना तथा केवल बच्चों के लिए एक पृथक डीडीटी सेन्टर स्थापित करना
  •     एचआईवी/एड्स सक्रंमित/प्रभावित सभी बच्चों के अधिकारों के संर्वधन तथा संरक्षण को माॅनीटर करना;
  •     राज्यों में बच्चों के लिए चलायी जा रहीं स्वास्थ्य देखभाल और पोषण नीतियों और कार्यों की निगरानी करना;
  •     तस्करी किये गये बच्चों का बचाव/बंधनमुक्ति/घर वापसी और शिक्षा, पोषण, स्वास्थ्य देखरेख तथा जीवन-कौशल प्रशिक्षण इत्यादि के जरिये उनके पुनर्वास को सुविधाजनक बनाना;
  •     राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोगों तथा आरईपीए (जहां उपलब्ध हों) के सहयोग से शिकायत निवारण कार्यप्रणाली को सुविधाजनक बनाना;
  •     जिला, खण्ड, पंचायत/मण्डल स्तर पर जीआर मेट्रिक्स का लाभ उठाना;
  •     गुवाहाटी और नागालैण्ड में ‘‘धन के बदले दुव्र्यवहार’’, ‘‘शिक्षा का अधिकार’’, और ‘‘बाल तस्करी’’ के विषयों पर जन सुनवाई करना।
  •     विभिन्न मंत्रालयों तथा विभागों जैसे श्रम, महिला एवं बाल विकास, पूर्वोत्तर क्षेत्र विकास (डोनर), सामाजिक न्याय और अधिकारिता, स्वास्थ्य और परिवार कल्याण आदि के साथ संयुक्त पुनरीक्षण अभियान तथा अंतर्मिलन बैठक का समर्थन करना।
  •     राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग के पूर्वाेत्तर प्रकोष्ठ द्वारा तैयार की गई पूर्वोत्तर कार्य योजना का कार्यान्वयन।
  •     पूर्वोत्तर के राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोगों और डोनेर के साथ निकट समन्वय करते हुए आयोग के पूर्वोत्त हब की स्थापना।
  •     पूर्वोत्तर के ऐसे राज्यों में राज्य आयोगों की स्थापना जहां ऐसे आयोग मौजूद नहीं हैं जैसे कि अरुणाचल प्रदेश, मेघालय, नागालैण्ड, त्रिपुरा, मणिपुर और मिजोरम।
  •     आश्रय गृहों, विशेष गृहों तथा संप्रेक्षण गृहों की स्थापना को सुविधाजनक बनाना।

 

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